दान, दशमांश और भेंट यह तीनों शब्दों का अर्थ एक जैसा लगता है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है इन तीनों का मतलब अलग अलग है ज्यादातर लोग इन्हें एक ही समझते है इसलिए इसके बारे में नहीं समझ पाते बहुत लोगों के मन में इसको लेकर शंका भी है इसलिए किसी को दान , दशमांश और भेंट देने से पहले यह पता होना जरुरी है की दान , दशमांश और भेंट किसे दी जाती है ? कैसी दी जाती है ? , कब दी जाती है ?, कहाँ दी जाती है ? और कितनी दी जाती है ? आईये इनके बारे में गहरायी से जाने।
दान (Alms)
दान पैसे के रूप में भी हो सकता है और किसी वास्तु के रूप में भी। दान वह होता है जिसे कोई व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी दुसरे व्यक्ति को उसकी मदद के रूप में देता है जैसे :- जरुरतमंदो को देना और गरीबो को देना इत्यादि। इसके लिए बाईबल बताती है की हमें दान देना चाहिए।
नीतिवचन 28 : 27 जो निर्धन को दान देता है उसे घटी नहीं होती, परन्तु जो उस से दृष्टि फेर लेता है वह शाप पर शाप पाता है।
लुका 6 : 38 दिया करो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा: लोग पूरा नाप दबा दबाकर और हिला हिलाकर और उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा ।
दान किसे दिया जाता है ? :- व्यवस्थाविवरण 15 : 11 में बाईबल बताती है की “ तेरे देश में दरिद्र तो सदा पाए जाएंगे, इसलिये मैं तुझे यह आज्ञा देता हूं कि तू अपने देश में अपने दीन-दरिद्र भाइयों को अपना हाथ ढीला करके अवश्य दान देना ” । यह यह परमेश्वर की तरफ से आज्ञा है की यदि हम दुसरो की मदद करने के योग्य है तो हमें जरुरतमंदो की मदद के लिए हाथ बढाना चाहिए।
कैसा दान दिया जाता है ? :- जब आप किसी को दान दो तो अच्छा दान दो ख़राब या बेकार नहीं जैसे किसी को रोटी देनी है तो ख़राब न दो की वह उसे खा भी न पाए , किसी को कपडा देना है तो ख़राब कपडा न दो की वह उसे पहन भी न पाए। हम कई बार अपनी वह चाजे लोगों को देने की सोचते है जो अब हमारे लायक नहीं है जिसे हम स्वीकार नहीं कर पा रहे है उसके बारे में हम यह कैसे सोच लेते है की अब हमारे फाटे कपडे हमारे लायक तो नहीं है लेकिन गरीब लोग तो फाटे कपडे पहन लेते है बाईबल बताती है
मत्ती 25 : 40 “ तब राजा उन्हें उत्तर देगा; मैं तुम से सच कहता हूं, कि तुम ने जो मेरे इन छोटे से छोटे भाइयों में से किसी एक के साथ किया, वह मेरे ही साथ किया ” । क्या हम अपने परमेश्वर के लिए फाटे कपडे देना चाहते है ख़राब रोटी देना चाहते है हमें चाहिए की हम अपने परमेश्वर को सर्वोतम दे।
दान कैसे दें ? :- मत्ती 6 : 1-2 “बाईबल सावधान रहो! तुम मनुष्यों को दिखाने के लिये अपने धर्म के काम न करो, नहीं तो अपने स्वर्गीय पिता से कुछ भी फल न पाओगे। इसलिये जब तू दान करे, तो अपने आगे तुरही न बजवा, जैसा कपटी, सभाओं और गलियों में करते हैं, ताकि लोग उन की बड़ाई करें, मैं तुम से सच कहता हूं, कि वे अपना फल पा चुके। दान कहाँ दे ? :- मत्ती 6 : 3 – 4 में बाईबल बताती है की “ जब तू दान करे, तो जो तेरा दाहिना हाथ करता है, उसे तेरा बांया हाथ न जानने पाए। ताकि तेरा दान गुप्त रहे; और तब तेरा पिता जो गुप्त में देखता है, तुझे प्रतिफल देगा ”॥
दान कब दे ? :- जब आपको लगे की उस व्यक्ति को किसी वस्तु की बेहद जरुरत है तब दे न वक्त से पहले न वक्त के बाद में । जैसे बाईबल बताती है
मत्ती 25 : 35 – 39 “क्योंकि मैं भूखा था, और तुम ने मुझे खाने को दिया; मैं प्यासा था, और तुम ने मुझे पानी पिलाया, मैं पर देशी था, तुम ने मुझे अपने घर में ठहराया। मैं नंगा था, तुम ने मुझे कपड़े पहिनाए; मैं बीमार था, तुम ने मेरी सुधि ली, मैं बन्दीगृह में था, तुम मुझ से मिलने आए ”। जब आप वक्त पर चीजो को दोगे तो दूसरा व्यक्ति भी चीजो की कद्र करेगा ।
कितना दान दे ? :- यह बात व्यक्ति के खुद के ऊपर है की वह कितना दे सकता है बाईबल इसके विषय में बताती है
2 कुरिन्थियों 9 : 7 “हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे न कुढ़ कुढ़ के, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है “।
कब तक दान दे ? :- इसके विषय में लोगों का अपना अपना मानना है कुछ सोचते की 1 दिन में एक व्यक्ति की ही मदद करेंगा बाईबल इसके बारे में कोई आज्ञा नहीं देती बायीं इसके बारे में सिर्फ यही बताती है
नीतिवचन 21 : 26 “कोई ऐसा है, जो दिन भर लालसा ही किया करता है, परन्तु धर्मी लगातार दान करता रहता है “। प्रभु की और से हमें यही मिला है धर्मी दान करता रहता है जब तक वो कर सकता है
दशमांश(Tithe)
दशमांश का मतलब है हमरी आमदनी का दसवां हिस्सा इसके विषय में बाईबल के पुराने नियम में बहुत सारी बाते देख सकते है जहाँ दशमांश को देना परमेश्वर की तरफ से एक आज्ञा के रूप में देखने को मिलती है नए नियम में दशमांश के बारे में इतना देखने को नहीं मिलता। लेकिन फिर भी हर चर्च में दशमांश देने के लिए बोला जाता है पुराने नियम में पहला दशमांश हमें उत्पत्ति में देखने को मिलता है जहाँ अब्राहम मलकिसिदक को अपनी लूट का पूरा पूरा दशमांश देता है “
उत्पत्ति 14 : 18 – 21 “जब शालेम का राजा मेल्कीसेदेक, जो परमप्रधान ईश्वर का याजक था, रोटी और दाखमधु ले आया। और उसने अब्राम को यह आशीर्वाद दिया, कि परमप्रधान ईश्वर की ओर से, जो आकाश और पृथ्वी का अधिकारी है, तू धन्य हो। और धन्य है परमप्रधान ईश्वर, जिसने तेरे द्रोहियों को तेरे वश में कर दिया है। तब अब्राम ने उसको सब का दशमांश दिया”। मलकिसिदक जब अब्राहम के पास आया और उसने अब्राहम को बताया की अब्राहम की यह जीत खुद अब्राहम की वजह से नहीं है बल्कि उस परमेश्वर से शत्रुओं को उसके वश में किया है तब अब्राहम ने इस बात पे विशवास करके मलकिसिदक को सारी लूट का दशमांश दिया। आईये हम इसके बारे में और गहरायी से जाने की हमें दशमांश क्यों देना , किसे देना चाहिए, किसको देना चाहिए , कब देना चाहिए, कहाँ देना चाहिए , कैसे देना चाहिए , कैसा देना चाहिए, कब तक देना चाहिए और कितना देना चहिये ? दशमांश क्यों देना चाहिए ? :- अब्राहम ने मलकिसिदक को सब दशमांश इसलिए दिया क्योंकि उसे पता चला की यह सब उसे परमेश्वर की वजह से ही मिला है इसलिए उसने उस लूट के दशमांश को परमेश्वर के याजक मलकिसिदक को देना उत्तम समझा ताकि यह दस्मंश परमेश्वर के राज्य को बढाने में इस्तेमाल हो सके।
हम सब परमेश्वर के राज्य को बढाने के लिए कार्य करते है और जब हम अपना दशमांश देते है तो परमेश्वर के राज्य को बढाने के लिए हम अपनी सहभागिता दिखाते है । जब हम किसी चर्च में जाते है तो चर्च के बहुत अन्य खर्च भी होते है जैसे जगह का किराया , म्यूजिक सम्बन्धी म काम करने वालो का तथा अन्य खर्चे जिनके बारे में हम नहीं जानते लेकिन उस चर्च के पास्टर को वो सभी खर्चों को लोगों के दशमांश से ही करने होते है और जब पास्टर के पास चर्च को बढाने के लिए पर्याप्त पैसे होते है तो पास्टर चर्च की उन्नति के लिए खुल के कार्य कर सकता है तब कलीसिया जो एक देह के सामान है वह मजबूत और स्वास्थ्य कलीसिया तैयार होती है
दशमांश किसे देना चाहिए ? :- दशमांश हर व्यक्ति को देना चाहिए जो अपने आप को चर्च का सदस्य समझता है यदि उसकी कोई आमदनी होती है तो। जैसे की हम जानते है की कलीसिया एक देह के सामान है तो आपकी देह की रक्षा करने का सवाल आये तो शारीर के किन अंगो को शारीर की रक्षा करनी चाहिए । आपके शरीर का हर अंग शरीर के ऐसे अंग को बचने की कोशिश करेगा जो शरीर को स्वास्थ्य रखने के लिए जरुरी है । कुछ लोगों का यह मानना है की चर्च के खर्चो का भार सिर्फ पास्टर को ही उठाना चाहिए । यह काम सिर्फ पास्टर का है की चर्च की जरूरतों को पूरा करे इसके लिए उसे काम करना चाहिए दिन रात मेहनत करनी चाहिए और पैसा कमाकर चर्च में लगाना चाहिए । इस बात के लिए वे बुद्धिजीवी लोग जो बाईबल का अधुरा ज्ञान रखते हुए बाईबल से उदाहरण देते हुए बताते है की देखो पौलूस भी तो तम्बू लगाकर पैसा कमाता था और परमेश्वर का कार्य भी करता था । हाँ ये बात सही है की पौलूस मेहनत करके जीवन यापन करता था और परमेश्वर का कार्य भी करता था बाईबल में दो प्रकार की सेवा है पतरस की सेवा :- पतरस की सेवा चर्च की सेवा है जिसमे व्यक्ति अकेले तौर पर परमेश्वर की सेवा नहीं करता बल्कि एक मसीही समूह के साथ परमेश्वर की सेवा करता है यह सेवा स्थायी होती है जिसमे अलग अलग सेवादार होते है जो अपनी सेवा देते है पौलुस की सेवा :- पौलुस की सेवा सुसमाचार की सेवा है जो हम सब करते ही है इस सेवा के लिए हमें चर्च की आवशयकता नहीं है पौलूस तम्बू लगाने का काम करता था वह जहाँ भी तम्बू लगाने जाता परमेश्वर के वचन को फैलता था कहीं भी रूककर परमेश्वर का कार्य नहीं करता था वह सुसमाचार देता था और आगे निकल जाता था यहाँ ताकि पौलुस की कोई कलीसिया नहीं थी पौलुस जगह जगह जाकर अन्य अन्य कलीसियाओं में परमेश्वर के वचन को बाटता था जैसे कुरिन्थियों की कलीसिया में , गलातियो की कलीसिया में , रोमियों की कलीसिया में और यरूशलेम की कलीसिया। हम सब पौलुस की तरह सेवा कर सकते है और कर भी रहे है लेकिन उस तरह की सेवा में और चर्च की सेवा में अंतर है एक चर्च का पास्टर काम कर सकता है और अपने परिवार का पालन पोषण कर सकता है पर यदि वह एक चर्च का अध्यक्ष भी है तो उसके लिए अपने परिवार तथा चर्च के कार्य का भार अकेले उठाना मुमकीन नहीं । जब मूसा ने परमेश्वर के लिए मिलाप वाला तम्बू बनाया तब हर इस्त्रयालि ने मिलाप वाले तम्बू को बनाए के लिए अपनी अपनी सहभागिता दिखाई ।
किसको देना चाहिए ? :- इस विषय में भी लोगों में शंका है की वह अपना दशमांश कहाँ दे । कुछ लोग इसे चर्च में देते है तो कुछ लोग सोचते है की इस चर्च में दो या फिर किसी गरीब जरुरतमंद को दो एक ही बात है लेकिन बाईबल इसके विषय में क्या कहती है की हम अपना दशमांश कहाँ देना चाहिए ।
लैव्यव्यवस्था 27 : 30 में लिखा है “फिर भूमि की उपज का सारा दशमांश, चाहे वह भूमि का बीज हो चाहे वृक्ष का फल, वह यहोवा ही का है; वह यहोवा के लिये पवित्र ठहरे”। तो जब ये परमेश्वर का है तो परमेश्वर तक यह दशमांश कैसे पहुंचे
गिनती 18 : 20 – 24 में लिखा है “फिर यहोवा ने हारून से कहा, इस्त्राएलियों के देश में तेरा कोई भाग न होगा, और न उनके बीच तेरा कोई अंश होगा; उनके बीच तेरा भाग और तेरा अंश मैं ही हूं। फिर मिलापवाले तम्बू की जो सेवा लेवी करते हैं उसके बदले मैं उन को इस्त्राएलियों का सब दशमांश उनका निज भाग कर देता हूं। और भविष्य में इस्त्राएली मिलापवाले तम्बू के समीप न आएं, ऐसा न हो कि उनके सिर पर पाप लगे, और वे मर जाएं। परन्तु लेवी मिलापवाले तम्बू की सेवा किया करें, और उनके अधर्म का भार वे ही उठाया करें; यह तुम्हारी पीढ़ीयों में सदा की विधि ठहरे; और इस्त्राएलियों के बीच उनका कोई निज भाग न होगा। क्योंकि इस्त्राएली जो दशमांश यहोवा को उठाई हुई भेंट करके देंगे, उसे मैं लेवियों को निज भाग करके देता हूं, इसीलिये मैं ने उनके विषय में कहा है, कि इस्त्राएलियों के बीच कोई भाग उन को न मिले”। इस्त्राएल के 12 गोत्र जब कनान देश पहुंचे तब कनान की सारी भूमि को 11 गोत्रों में बाँट दिया गया लेकिन लेवी के भाग में कुछ नहीं दिया गया क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें अपने काम के लिए रखा था। बाईबल के
मालकी 3 :10 में लिखा है “सारे दशमांश भण्डार में ले आओ कि मेरे भवन में भोजनवस्तु रहे; और सेनाओं का यहोवा यह कहता है, कि ऐसा कर के मुझे परखो कि मैं आकाश के झरोखे तुम्हारे लिये खोल कर तुम्हारे ऊपर अपरम्पार आशीष की वर्षा करता हूं कि नहीं”। ताकि भंडार में आये सभी पैसो का इस्तेमाल चर्च के कामो में लगाया जाये
दशमांश कब देना चाहिए? :- इसका कोई ऐसा निश्चित समय नहीं है लेकिन ये लोगों पर ही निर्भर करता है की वह कब दे सकते है जैसे पहले समय में इस्त्राएलि प्रति वर्ष अपना दशमांश देते थे क्योंकि वे साल बहर में एक बार ही काटते थे इसलिए साल में देते थे लेकिन आज का समय बदल गया है हर व्यक्ति प्रति माह अपनी तनखा पाता है इसलिए वे प्रति माह दे सकते है
दशमांश कैसे देना चाहिए? :- हम दशमांश देने से पहले हिसाब लगाते है की कितना पैसा कहाँ देना है और अगर लगता है की इस बार तनख्वा कम मिली है तो हम कई बार ये सोचते है की इस बार दशमांश न देकर हम अगले महीने इस महीने का भी दे देंगे । चर्च हमारे परिवार के सदस्य की तरह होता है यदि किसी महीने आपको कम तनख्वा मिले तो आप अपने परिवार के किस सदस्य से चाहोगे की वह इस महीने खाना न खाए अगले महीने जब ठीक तनख्वा मिलेगी तो इस महीने का भी इक्कठा अगले महीने खा लेना हममे से कोई भी ऐसा नहीं करेगा बल्कि वो यही चाहेगा की जितना भी हमारे पास है सब मिल बाँट के खाएं । और परमेश्वर तो हमारे परिवार से भी बढकर है बाईबल हमें बताती है
व्यवस्थाविवरण 26 : 12 में लिखा है “तीसरे वर्ष जो दशमांश देने का वर्ष ठहरा है जब तू अपनी सब भांति की बढती के दशमांश को निकाल चुके तब उसे लेवीय , परदेशी , अनाथ और विधवा को देना की वे तेरे फाटकों के भीतर खाकर तृप्त हों” । इसका मतलब हमें दशमांश को सब हिसाब से पहले निकलना है उसके बाद आप अपना खर्चा कर सकते हो यदि आपके पास कोई जरुरतमंद मदद के लिए आये और यदि आप देने के योग्य हो तो दे सकते हो । या किसी को अपना दान और भेंट दे सकते है कैसा दशमांश देना चाहिए? :- ये बेहद जरुरी बात है की हम दशमांश का बीज बोएं तो हर्ष के साथ बोएं बाईबल इसके विषय में बताती है
2 कुरिन्थियों 9 : 7 “हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे न कुढ़ कुढ़ के, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है” ।
हमें चाहिए की हम परमेश्वर के लिए उत्तम दशमांश दे। मलाकी 1:7-10 में लिखा है “पुत्र पिता का, और दास स्वामी का आदर करता है। यदि मैं पिता हूं, तो मेरा आदर मानना कहां है? और यदि मैं स्वामी हूं, तो मेरा भय मानना कहां? सेनाओं का यहोवा, तुम याजकों से भी जो मेरे नाम का अपमान करते हो यही बात पूछता है। परन्तु तुम पूछते हो, हम ने किस बात में तेरे नाम का अपमान किया है? तुम मेरी वेदी पर अशुद्ध भोजन चढ़ाते हो। तौभी तुम पूछते हो कि हम किस बात में तुझे अशुद्ध ठहराते हैं? इस बात में भी, कि तुम कहते हो, यहोवा की मेज तुच्छ है। जब तुम अन्धे पशु को बलि करने के लिये समीप ले आते हो तो क्या यह बुरा नहीं? और जब तुम लंगड़े वा रोगी पशु को ले आते हो, तो क्या यह बुरा नहीं? अपने हाकिम के पास ऐसी भेंट ले आओ; क्या वह तुम से प्रसन्न होगा वा तुम पर अनुग्रह करेगा? सेनाओं के यहोवा का यही वचन है और अब मैं तुम से कहता हूं, ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह हम लोगों पर अनुग्रह करे। यह तुम्हारे हाथ से हुआ है; तब क्या तुम समझते हो कि परमेश्वर तुम में से किसी का पक्ष करेगा? सेनाओं के यहोवा का यही वचन है। भला होता कि तुम में से कोई मन्दिर के किवाड़ों को बन्द करता कि तुम मेरी वेदी पर व्यर्थ आग जलाने न पाते! सेनाओं के यहोवा का यह वचन है, मैं तुम से कदापि प्रसन्न नहीं हूं, और न तुम्हारे हाथ से भेंट ग्रहण करूंगा”। हम परमेश्वर के लिए दूषित भेंट न लाएं अन्यथा हमारी भेंट स्वीकार योग्य नहीं होगी । इसलिए हम परमेश्वर को सर्वोतम भेंट चढाएं। दशमांश कब तक देना चाहिए? :- जब तक आप चर्च को अपने परिवार की तरह समझते हो और अपने आप को चर्च का सदस्य समझते हो तब तक आपको अपना दशमांश देना चाहिए यदि आपको लगता है की चर्च में पैसो का गलत इस्तेमाल हो रहा है तो आपको परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए की परमेश्वर आपको एक अच्छा चर्च दिखाए ।
दशमांश कितना देना चाहिए? : पुराने नियम में दशमांश के लिए तय था की हर व्यक्ति को अपनी आय का दसवां हिस्सा परमेश्वर के लिए देना होगा परन्तु नय नियम में ऐसा कुछ तय नहीं है नय नियम में लिखा है
2 कुरिन्थियों 9:7 “हर एक जन जैसा मन में ठाने वैसा ही दान करे न कुढ़ कुढ़ के, और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है”। मतलब आपके ऊपर कोई दबाव नहीं है की आपको दशमांश देना ही है। बल्कि परमेश्वर आपसे चाहता है की आप जितना भी दो उत्तम दो , हर्ष के साथ दो और बिना कुढ़ कुढ़ दो । लेकिन पुराने नियम में जो ये तरीका परमेश्वर की तरफ से निकला गया था वह ठीक ही है क्योंकि यदि सबको महीने के 10 हजार देने के लिए कहा जाये तो यह उनके लिए तो कोई दिक्कत की बात नहीं होगी जिनके पास पैसो की कमी नहीं है जिनका अच्छा बड़ा व्यापर है लेकिन उन लोगों के लिए बहुत ही बड़ी समस्या की बात हो जाएगी जिनकी तनख्वा ही 7 या 8 हजार है वो 10 हजार कहाँ से दे पाएँगे । इसलिए परमेश्वर की तरफ से ये तय किया गया बहुत उचित है की लोग अपनी आय का दशमांश दे इससे किसी पे जोर भी नहीं पेदेगा और हर कोई परमेश्वर के राज्य को बढाने में अपनी सह्भाग्यता दे सकते है । नय नियम में
मत्ती 23:23 में लिखा है “हे कपटी शास्त्रियों, और फरीसियों, तुम पर हाय; तुम पोदीने और सौंफ और जीरे का दसवां अंश देते हो, परन्तु तुम ने व्यवस्था की गम्भीर बातों को अर्थात न्याय, और दया, और विश्वास को छोड़ दिया है; चाहिये था कि इन्हें भी करते रहते, और उन्हें भी न छोड़ते”। इस आयात में यीशु मसीह कहते है की उन्हें चाहिए था की वे इन्हें भी करते रहते अर्थात दशमांश भी देते रहते , और उन्हें भी न छोड़ते अर्थात व्यवस्था का पालन भी करते । इन आयातों से पता चलता है की यीशु दशमांश के खिलाफ नहीं है बल्कि दशमांश के पक्ष में है ।
भेंट(Offering)
भेंट और दान के बीच बहुत बड़ा अंतर है लेकिन हम इसे अंतर को न समझकर इसे भी दान ही समझते है भेंट दान भेंट एक प्रकार का उपहार होता है भेंट किसी से मिलते वक़्त देते है भेंट ख़ुशी में दुसरे के सम्मान में दी जाती है भेंट हम किसी को भी दे सकते है चाहे वो किसी पे आश्रित हो या आत्मनिर्भर हो दान एक मदद होती है दान किसी की जरुरत पे दिया जाता है दान किसी की जरुरत में तरस खाकर दिया जाता है दान उसे देते है जो दुसरो पे आश्रित होता है भेंट के बारे में बाईबल बताती है की हमें भेंट देनी चाहिए जब भी हम किसी ऐसे व्यक्ति से मिलने जाते है जिससे हम प्यार करते है या उसका सम्मान करते है तो उसके सम्मान में हम भेंट लेकर जाते है। यदि किसी रिश्तेदार से मिलने जाते है तो उसके सम्मान में हम कुछ भेंट लेकर जाते है वो कुछ भी हो सकता है फल या इस्तेमाल की कोई वस्तु हमारी यही सोच होती है की हम उसके लिए ऐसी भेंट लेके जाये जो उसके काम की हो वह उसे इतेमाल कर सके जिसे देखकर उसे ख़ुशी भी हो और वो भेंट वो व्यक्ति दिल से उसे ग्रहण भी करे और जो हमारा पिता परमेश्वर है उससे मिलने जब हम जाते है तो तब भी हम यही सोच कर अपनी भेंट लेके जाना चाहिए की उस भेट को परमेश्वर ग्रहण भी करे